उलझने है बहुत - लक्ष्मी सिंदे

उलझने है बहुत
खुद ही सुलझा लिया करती हू ।
मेरी तकलीफ औरो को पता ना चले
इसलिए ,
अकेली बिस्तर मै , रोया करती हू ।
क्यों नुमाइश करू मै अपने
माथे के नशिब का
उस बनाने वाले ने
मुझे सोच समझकर बनाया है ।
उस पर बहुत भरोसा है ।
वही उलझन मे डालेगा
और वही सुलझाने की ताकत भी देगा ।
 जब लडना है खुद को खुद से
 तो क्यो किसी और से तुलना करू
कभी खुद ही जीता देती हू ।
कभी खुद ही जीत जाती हू ।

        .... laxmi  Shinde ....
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Milan Tomic

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