सहारनपुर, संवाददाता - विजय कुमार शर्मा
यह दृश्य मानवता की सबसे खूबसूरत और सशक्त तस्वीर पेश करता है। सुनीता अरोड़ा जी का 180 किलोमीटर का सफर तय करके सिर्फ इसलिए आना कि वह मोहम्मद जुनैद जैसे निस्वार्थ सेवाभावी व्यक्ति को अपना आशीर्वाद दे सकें, यह साबित करता है कि इंसानियत किसी भी धर्म या सरहदों से बहुत बड़ी है।
सुनीता जी का जुनैद को गले लगाकर यह कहना कि "माँ तुमसे मिलने आई है," केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक गहरा मानवीय संदेश है। यह दर्शाता है कि:
सेवा का कोई धर्म नहीं होता: जुनैद द्वारा किए जा रहे सेवा कार्य ने यह सिद्ध कर दिया कि परोपकार का रंग केवल 'इंसानियत' का होता है।
मातृत्व का कोई बंधन नहीं: एक बुजुर्ग माँ ने अपनी ममता से यह साबित किया कि स्नेह का दायरा कितना व्यापक हो सकता है। उन्होंने जुनैद में उस सेवाभाव को देखा जो समाज को एकजुट रखने के लिए सबसे जरूरी है।
सम्मान का प्रतीक: जब उन्होंने कहा कि "आप लोग इंसानियत के काम करते हो," तो उन्होंने न केवल जुनैद के प्रयासों को सराहा, बल्कि उस जज्बे को भी सलाम किया जो निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुख कम करने की कोशिश करता है।
ऐसी घटनाएँ इस बात की याद दिलाती हैं कि आज के दौर में भी हमारे समाज की नींव 'प्यार और करुणा' पर टिकी है। जंतर-मंतर जैसे स्थान, जो अक्सर विरोध और संघर्ष के गवाह बनते हैं, वहाँ ऐसी हृदयस्पर्शी घटना का होना यह उम्मीद जगाता है कि अंत में इंसानियत ही जीतती है।
यह घटना न केवल जुनैद के लिए एक बड़ा सम्मान है, बल्कि हम सभी के लिए एक प्रेरणा है कि हम अपने दैनिक जीवन में भी कैसे एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता और अपनापन रख सकते हैं।

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